जया एकादशी व्रत कथा

Jaya Ekadashi Vrat Katha

भगवान श्री विष्णु माघ शुक्ल पक्ष एकादशी
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संक्षिप्त उत्तर

जया एकादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। यह व्रत समस्त पापों पर विजय दिलाता है, इसलिए इसे "जया" कहते हैं। भगवान विष्णु की पूजा करके यह व्रत रखने से प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और वैकुंठ धाम प्राप्त होता है।

जया एकादशी व्रत कथा — संपूर्ण कथा

देवराज इंद्र के स्वर्गलोक में माल्यवान नामक एक गंधर्व और पुष्पवती नामक एक अप्सरा रहते थे। दोनों एक-दूसरे से अत्यंत प्रेम करते थे। वे सदा साथ रहते, साथ गाते और नृत्य करते थे। उनका प्रेम इतना गहरा था कि वे एक क्षण भी अलग नहीं रह सकते थे।

एक बार देवराज इंद्र की सभा में देवताओं के समक्ष गंधर्व-अप्सराओं का नृत्य और गायन हो रहा था। माल्यवान और पुष्पवती को भी प्रस्तुति देने का आदेश मिला। किंतु दोनों प्रेम में इतने मग्न थे कि उनका ध्यान प्रस्तुति पर नहीं था। उनके गायन में अनेक त्रुटियां हुईं और नृत्य भी अशुद्ध रहा।

देवराज इंद्र इससे अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने माल्यवान और पुष्पवती को शाप दिया — "तुम दोनों ने मेरी सभा का अपमान किया है। इसलिए तुम दोनों प्रेत योनि में जन्म लो और पृथ्वी पर भटको।" इंद्र के शाप से दोनों तत्काल प्रेत योनि में गिर गए और हिमालय की बर्फीली चोटियों पर भटकने लगे।

प्रेत योनि में माल्यवान और पुष्पवती को अत्यंत कष्ट था। भयंकर शीत, भूख-प्यास और अंधकार — यही उनका जीवन था। न कोई आश्रय था, न भोजन, न वस्त्र। वे दिन-रात विलाप करते और इंद्र के शाप से मुक्ति के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना करते रहते थे।

संयोग से माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी आई। उस दिन उन दोनों प्रेतों ने भूख-प्यास के कारण कुछ नहीं खाया और न ही जल ग्रहण किया। रात्रि भर ठंड में कांपते हुए जागते रहे और भगवान विष्णु का नाम लेते रहे। इस प्रकार अनजाने में ही उन्होंने एकादशी का उपवास और रात्रि जागरण कर लिया।

एकादशी व्रत और रात्रि जागरण के पुण्य से उन दोनों के समस्त पाप नष्ट हो गए। प्रातःकाल होते ही एक दिव्य विमान आकाश से उतरा। भगवान विष्णु के दूतों ने माल्यवान और पुष्पवती को प्रेत योनि से मुक्त किया। दोनों ने अपना दिव्य गंधर्व-अप्सरा रूप पुनः प्राप्त किया।

विष्णुदूतों ने कहा — "जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से तुम दोनों प्रेत योनि से मुक्त हुए हो। यह एकादशी इतनी शक्तिशाली है कि प्रेत योनि में पड़े प्राणी को भी मुक्ति दिला देती है।" माल्यवान और पुष्पवती पुनः स्वर्गलोक लौट गए और देवराज इंद्र ने भी उन्हें क्षमा कर दिया।

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा — "हे राजन! जया एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है। यदि किसी के पूर्वज प्रेत योनि में हैं तो इस व्रत के पुण्य से उन्हें भी मुक्ति मिलती है। जो भी श्रद्धापूर्वक यह व्रत करता है, उसे वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।"

संदर्भ: यह कथा भविष्योत्तर पुराण में वर्णित है। भगवान श्रीकृष्ण ने गंधर्व माल्यवान और अप्सरा पुष्पवती की कथा के माध्यम से जया एकादशी का माहात्म्य युधिष्ठिर को बताया।

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ऑडियो कथा सुनें

माघ शुक्ल पक्ष को भगवान श्री विष्णु की पूजा कैसे करें?

1

प्रातःकाल स्नान और संकल्प

ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें। स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु के समक्ष बैठकर व्रत का संकल्प लें — "मैं समस्त पापों के नाश और मोक्ष प्राप्ति हेतु जया एकादशी का व्रत करता/करती हूं।"

2

भगवान विष्णु की षोडशोपचार पूजा

भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएं। षोडशोपचार पूजा करें — आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, उपवीत, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा, प्रदक्षिणा और प्रणाम।

3

तुलसी अर्पण और मंत्र जाप

भगवान विष्णु को तुलसी दल, पीले पुष्प और चंदन अर्पित करें। तुलसी माला पर "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का 108 बार या अधिक जाप करें।

4

कथा श्रवण

जया एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करें। गंधर्व माल्यवान और अप्सरा पुष्पवती की कथा ध्यानपूर्वक सुनें। कथा के बाद आरती करें।

5

रात्रि जागरण और भजन

एकादशी की रात्रि को जागकर बिताएं। भगवान विष्णु के भजन, कीर्तन और स्तुति गाएं। विष्णु सहस्रनाम या भगवद् गीता का पाठ करें। दीपक जलाकर रखें।

6

द्वादशी पारण और दान

द्वादशी को पारण काल में व्रत खोलें। ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा दें। निर्धनों को अन्न-वस्त्र दान करें। इसके बाद स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण करें।

जया एकादशी व्रत कथा में क्या सामग्री चाहिए?

भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) तुलसी दल और पीले पुष्प चंदन, कुमकुम और अक्षत घी का दीपक अगरबत्ती और कपूर पीले फल (नैवेद्य हेतु) गंगाजल तुलसी की माला सुपारी, पान और लौंग

📿 मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भगवान वासुदेव (विष्णु) को मेरा प्रणाम है। यह मंत्र समस्त पापों को नष्ट करता है और भगवान विष्णु की कृपा प्रदान करता है।

📿 अन्य मंत्र

ॐ विष्णवे नमः

ॐ नमो नारायणाय

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्

जया एकादशी व्रत कथा के नियम

  • एकादशी को पूर्ण उपवास या फलाहार रखें
  • चावल और अनाज का सेवन वर्जित है
  • रात्रि जागरण करें — यह इस व्रत का विशेष अंग है
  • ब्रह्मचर्य और सत्य का पालन करें
  • किसी की निंदा न करें और क्रोध से बचें
  • दशमी को एक समय भोजन करें
  • द्वादशी को समय पर पारण करें

✅ क्या खाएं

  • ताज़े फल (केला, सेब, अनार, पपीता)
  • सेंधा नमक वाले फलाहारी व्यंजन
  • साबूदाना की खिचड़ी या खीर
  • कुट्टू या सिंघाड़े के आटे के व्यंजन
  • दूध, दही और पनीर
  • मेवे और सूखे मेवे
  • शकरकंद और आलू

❌ क्या न खाएं

  • चावल और सभी प्रकार के अनाज
  • गेहूं का आटा और दालें
  • प्याज, लहसुन और हरी सब्ज़ियां
  • मांसाहार, अंडा और मछली
  • सामान्य नमक (केवल सेंधा नमक उपयोग करें)
  • तेल में तली हुई चीज़ें
  • बासी और तामसिक भोजन

जया एकादशी व्रत कथा के लाभ

  • समस्त पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है
  • प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है
  • पितरों और पूर्वजों को सद्गति प्राप्त होती है
  • भगवान विष्णु की विशेष कृपा मिलती है
  • मृत्यु के पश्चात वैकुंठ धाम प्राप्त होता है
  • भय, शोक और दुःख का निवारण होता है
  • सहस्र अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल मिलता है

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जया एकादशी का व्रत क्यों करना चाहिए?

जया एकादशी पापों पर विजय दिलाने वाली है। इस व्रत से प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है। यदि आपके पूर्वज किसी अधम योनि में हैं तो इस व्रत का पुण्य उन्हें भी मुक्ति दिलाता है। सभी पापों का नाश और वैकुंठ की प्राप्ति होती है।

जया एकादशी कब आती है?

जया एकादशी प्रतिवर्ष माघ मास (जनवरी-फरवरी) के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना का विधान है।

क्या जया एकादशी पर रात्रि जागरण आवश्यक है?

हां, इस एकादशी पर रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। कथा में माल्यवान और पुष्पवती को रात्रि जागरण से ही मुक्ति मिली थी। भजन-कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करना चाहिए।

जया एकादशी की कथा किस ग्रंथ में है?

जया एकादशी की कथा भविष्योत्तर पुराण में वर्णित है। इसमें गंधर्व माल्यवान और अप्सरा पुष्पवती को इंद्र के शाप से मुक्ति मिलने की कथा है। भगवान श्रीकृष्ण ने यह कथा युधिष्ठिर को सुनाई थी।

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