पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

Papmochani Ekadashi Vrat Katha

भगवान श्री विष्णु चैत्र कृष्ण पक्ष एकादशी
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संक्षिप्त उत्तर

पापमोचनी एकादशी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। इसका अर्थ है "पापों से मुक्ति दिलाने वाली।" यह व्रत जाने-अनजाने किए गए समस्त पापों का नाश करता है। भगवान विष्णु की पूजा करके यह व्रत करने से ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा — संपूर्ण कथा

प्राचीन काल में चैत्ररथ नामक एक सुंदर वन था जहां ऋषि मेधावी तपस्या करते थे। ऋषि मेधावी महर्षि च्यवन के पुत्र थे और अत्यंत तपस्वी तथा ब्रह्मचारी थे। उनकी तपस्या इतनी प्रबल थी कि देवराज इंद्र को अपना सिंहासन डोलता प्रतीत हुआ।

देवराज इंद्र ने ऋषि मेधावी की तपस्या भंग करने के लिए मंजुघोषा नामक एक अत्यंत सुंदर अप्सरा को भेजा। मंजुघोषा अपने रूप, गायन और नृत्य से किसी को भी मोहित कर सकती थी। वह चैत्ररथ वन में पहुंची और ऋषि मेधावी के आश्रम के निकट मधुर स्वर में गाने लगी।

मंजुघोषा के मधुर गायन और कोयल जैसी वाणी से ऋषि मेधावी की तपस्या भंग हो गई। उन्होंने नेत्र खोले और मंजुघोषा के अपूर्व सौंदर्य को देखा। काम के वशीभूत होकर ऋषि अपना ब्रह्मचर्य व्रत भूल गए और मंजुघोषा के साथ अनेक वर्ष व्यतीत किए।

अनेक वर्षों बाद जब ऋषि मेधावी को होश आया तो उन्हें अत्यंत पश्चाताप हुआ। उन्होंने मंजुघोषा से क्रोधित होकर कहा — "तूने मेरी वर्षों की तपस्या नष्ट कर दी। मैं तुझे शाप देता हूं कि तू पिशाचिनी हो जा।" मंजुघोषा भयभीत होकर रोने लगी और ऋषि से क्षमा मांगने लगी।

मंजुघोषा ने विलाप करते हुए कहा — "हे मुनिवर! मुझे इंद्र ने भेजा था, यह मेरा अपराध नहीं है। कृपया मुझे इस शाप से मुक्ति का उपाय बताएं।" ऋषि मेधावी को दया आई और उन्होंने कहा — "चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी जिसे पापमोचनी एकादशी कहते हैं, उसका विधिपूर्वक व्रत कर। इस व्रत के प्रभाव से तू शाप मुक्त हो जाएगी।"

ऋषि मेधावी ने स्वयं भी अपने पाप के प्रायश्चित्त हेतु पापमोचनी एकादशी का व्रत करने का निर्णय किया। उन्होंने अपने पिता महर्षि च्यवन के पास जाकर सारी घटना बताई। महर्षि च्यवन ने कहा — "पुत्र! पापमोचनी एकादशी का व्रत करो। यह एकादशी ब्रह्महत्या जैसे महापाप को भी नष्ट कर देती है।"

मंजुघोषा ने पूर्ण विधि-विधान से पापमोचनी एकादशी का व्रत किया। उसने निर्जला उपवास रखा, भगवान विष्णु की पूजा की, रात्रि भर जागरण किया और विष्णु मंत्रों का जाप किया। व्रत के प्रभाव से उसका पिशाचिनी शाप समाप्त हो गया और वह पुनः अपने दिव्य अप्सरा रूप में लौट गई।

ऋषि मेधावी ने भी पापमोचनी एकादशी का व्रत किया और उनके भी समस्त पाप नष्ट हो गए। उन्होंने पुनः तपस्या आरंभ की और इस बार कोई भी उनकी तपस्या भंग नहीं कर सका। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा — "जो मनुष्य पापमोचनी एकादशी का व्रत करता है, उसके जाने-अनजाने किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।"

संदर्भ: यह कथा भविष्य पुराण में वर्णित है। महर्षि च्यवन के पुत्र ऋषि मेधावी और अप्सरा मंजुघोषा की कथा के माध्यम से पापमोचनी एकादशी का माहात्म्य बताया गया है।

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ऑडियो कथा सुनें

चैत्र कृष्ण पक्ष को भगवान श्री विष्णु की पूजा कैसे करें?

1

प्रातःकाल स्नान और संकल्प

ब्रह्ममुहूर्त में उठकर गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर बैठकर संकल्प लें — "समस्त पापों के मोचन हेतु मैं पापमोचनी एकादशी का व्रत करता/करती हूं।"

2

भगवान विष्णु की पूजा

भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम की पंचामृत से अभिषेक करें। तुलसी दल, पीले पुष्प, चंदन और अक्षत चढ़ाएं। नैवेद्य अर्पित करें। धूप-दीप जलाएं।

3

मंत्र जाप और प्रार्थना

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का 108 बार या अधिक जाप करें। भगवान विष्णु से प्रार्थना करें कि आपके जाने-अनजाने किए गए सभी पापों को क्षमा करें।

4

कथा श्रवण

पापमोचनी एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करें। ऋषि मेधावी और अप्सरा मंजुघोषा की कथा ध्यानपूर्वक सुनें। कथा के बाद आरती करें।

5

रात्रि जागरण और भजन

एकादशी की रात्रि को जागकर बिताएं। भगवान विष्णु के भजन गाएं, विष्णु सहस्रनाम या भगवद् गीता का पाठ करें। दीपक जलाकर रखें।

6

द्वादशी पारण और दान

द्वादशी को पारण काल में व्रत खोलें। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दें। निर्धनों को अन्न, वस्त्र दान करें। तुलसी का जल पीकर पारण करें।

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा में क्या सामग्री चाहिए?

भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) तुलसी दल और पीले पुष्प चंदन, कुमकुम और अक्षत घी का दीपक और अगरबत्ती कपूर (आरती हेतु) पीले फल (केला, आम) गंगाजल तुलसी की माला (जाप हेतु) भोग सामग्री (मिठाई)

📿 मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भगवान वासुदेव को मेरा नमस्कार। यह मंत्र समस्त पापों का नाश करने वाला है। पापमोचनी एकादशी पर इस मंत्र के जाप से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं।

📿 अन्य मंत्र

ॐ विष्णवे नमः

ॐ नमो नारायणाय

ॐ श्री हरये नमः

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा के नियम

  • एकादशी को पूर्ण उपवास या फलाहार रखें
  • चावल और सभी अनाज का त्याग करें
  • ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है
  • मन, वचन और कर्म से पाप न करें
  • किसी की निंदा, चुगली और असत्य से बचें
  • रात्रि जागरण करें
  • दशमी से ही सात्विक आचरण अपनाएं

✅ क्या खाएं

  • ताज़े फल (केला, सेब, अनार, संतरा)
  • सेंधा नमक वाले फलाहारी व्यंजन
  • साबूदाना की खिचड़ी
  • कुट्टू या सिंघाड़े के आटे की रोटी
  • दूध, दही, पनीर
  • मेवे (बादाम, काजू, अखरोट)
  • शकरकंद और आलू (सेंधा नमक)

❌ क्या न खाएं

  • चावल और चावल से बने पदार्थ
  • गेहूं, जौ, बाजरा आदि अनाज
  • प्याज, लहसुन
  • मांस, मछली, अंडा
  • दालें, राजमा, छोले
  • सामान्य नमक
  • मसालेदार, तला हुआ और बासी भोजन

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा के लाभ

  • जाने-अनजाने किए गए समस्त पापों का नाश होता है
  • ब्रह्महत्या जैसे महापापों से भी मुक्ति मिलती है
  • पूर्वजन्मों के पापों का क्षय होता है
  • मन को शांति और पवित्रता प्राप्त होती है
  • भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि आती है
  • शाप और अभिशाप से मुक्ति मिलती है
  • मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पापमोचनी एकादशी का क्या अर्थ है?

"पापमोचनी" का अर्थ है "पापों से मुक्ति देने वाली।" यह एकादशी इसलिए विशेष है क्योंकि यह जाने-अनजाने किए गए सभी प्रकार के पापों — छोटे और बड़े — सभी का नाश करती है।

पापमोचनी एकादशी कब आती है?

पापमोचनी एकादशी प्रतिवर्ष चैत्र मास (मार्च-अप्रैल) के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। यह हिंदू नववर्ष (चैत्र नवरात्रि) से कुछ दिन पहले आती है।

क्या पापमोचनी एकादशी से सभी प्रकार के पाप नष्ट होते हैं?

हां, शास्त्रों के अनुसार यह एकादशी ब्रह्महत्या जैसे महापाप से लेकर जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों का नाश करती है। किंतु भविष्य में पाप न करने का संकल्प आवश्यक है।

पापमोचनी एकादशी की कथा किस पुराण में है?

पापमोचनी एकादशी की कथा भविष्य पुराण में वर्णित है। इसमें ऋषि मेधावी और अप्सरा मंजुघोषा की कथा है। भगवान श्रीकृष्ण ने यह कथा युधिष्ठिर को सुनाई थी।

क्या पापमोचनी एकादशी पर विशेष दान करना चाहिए?

हां, इस एकादशी पर अन्न दान, वस्त्र दान और गोदान का विशेष महत्व है। ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा देनी चाहिए। पापों के प्रायश्चित्त हेतु दान-पुण्य करना अत्यंत लाभकारी है।

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