नामकरण संस्कार

कुलदेवता, भगवान गणेश, अग्निदेव 1.5-2 घंटे जन्म के 11वें या 21वें दिन (बच्चे की उम्र 11 दिन से 1 वर्ष)

📖 कथा / महत्व

नामकरण संस्कार वैदिक परंपरा के सोलह संस्कारों में पांचवां संस्कार है। शास्त्रों के अनुसार नाम में अद्भुत शक्ति होती है — "यथा नाम तथा गुणाः" अर्थात जैसा नाम होता है वैसे ही गुण बालक में विकसित होते हैं। गृह्यसूत्रों में कहा गया है कि जन्म नक्षत्र के अनुसार शुभ अक्षर से नाम रखने पर ग्रहों का शुभ प्रभाव बालक पर पड़ता है। नाम ही बालक की सामाजिक और आध्यात्मिक पहचान का आधार होता है।

🗓️ सर्वोत्तम दिन: जन्म के 11वें दिन — सबसे प्रचलित एवं शास्त्रसम्मतजन्म के 12वें या 21वें दिन — यदि 11वें दिन मुहूर्त न होशुक्ल पक्ष की द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी तिथिशुभ नक्षत्र — अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, रेवतीकुछ परिवारों में 101वें दिन या छठे माह में भी नामकरण किया जाता है ⏱️ 1.5 से 2 घंटे (हवन एवं भोज सहित) 🟢 शुरुआती

🧘 पूजा से पहले — तैयारी

📋 सामग्री

हवन सामग्री — 250 ग्राम शुद्ध शहद — 50 ग्राम (शिशु को चटाने हेतु) सोने की सलाई या चम्मच — 1 (शहद चटाने हेतु) अक्षत (साबुत चावल) — 200 ग्राम हल्दी — 25 ग्राम कुमकुम (सिंदूर) — 25 ग्राम नए वस्त्र (शिशु हेतु) — 2 जोड़ी कलश एवं शुद्ध जल — 1 सेट गंगाजल — 100 मिली धूप एवं अगरबत्ती — 1 पैकेट घी के दीपक — 5 कपूर — 1 पैकेट मिठाई (लड्डू या पेड़ा) — 1 किलो फल (केला, सेब, नारियल) — 5-7 पीस पान, सुपारी, लौंग — 11-11 पीस नारियल — 2 मौली (कलावा) — 1 गोला चंदन — 10 ग्राम आम की लकड़ी (हवन हेतु) — 500 ग्राम हल्दी-उबटन (शिशु स्नान हेतु) पालना या झूला सजाने की सामग्री दक्षिणा — यथाशक्ति जन्म कुंडली या पंचांग — नामाक्षर जानने हेतु

📝 पूजा विधि — चरण

1

पूजा स्थल की सजावट (15 मिनट)

घर को साफ करके सजाएं। पूजा स्थल पर रंगोली बनाएं। पालना या झूला सजाएं। द्वार पर आम के पत्तों का तोरण बांधें। शिशु के लिए नए वस्त्र तैयार रखें।

2

शिशु का स्नान एवं श्रृंगार (10 मिनट)

शिशु को गुनगुने पानी में हल्दी-उबटन लगाकर स्नान कराएं। माता भी स्नान करें। शिशु को नए वस्त्र पहनाएं और काजल लगाएं। टीका लगाएं। शिशु को माता की गोद में बिठाएं।

3

गणेश पूजन एवं कलश स्थापना (10 मिनट)

गणेश जी का पूजन करें — सिंदूर, दूर्वा अर्पित करें। कलश स्थापना करें। दीपक प्रज्वलित करें। धूप-अगरबत्ती जलाएं। "ॐ गं गणपतये नमः" का जाप करें।

4

संकल्प (5 मिनट)

पिता पुरोहित के साथ नामकरण संस्कार का संकल्प लें। अपना नाम, गोत्र, शिशु का जन्म नक्षत्र, जन्म तिथि और संकल्प का उद्देश्य बोलें। माता शिशु को गोद में लिए संकल्प में सम्मिलित हों।

5

कुलदेवता एवं पितृ पूजन (10 मिनट)

कुलदेवता का आवाहन कर पूजन करें। पितरों (पूर्वजों) का स्मरण करें और उनसे शिशु के कल्याण की प्रार्थना करें। अक्षत, पुष्प, धूप अर्पित करें। कुल परंपरा अनुसार विशेष पूजा करें।

6

नामकरण विधि — नाम रखना (10 मिनट)

पुरोहित जन्म कुंडली या पंचांग से शुभ नामाक्षर बताएं। पिता शिशु को गोद में लें। शिशु के दाहिने कान में चुना हुआ नाम तीन बार बोलें — "तव नाम (नाम) इति"। फिर माता बाएं कान में नाम बोलें। सभी उपस्थित जन नाम दोहराएं।

7

शहद चटाना — जिह्वा लेखन (5 मिनट)

सोने की सलाई या चम्मच से शिशु की जीभ पर शहद से "ॐ" या शिशु का नाम लिखें। फिर शहद की बूंद चटाएं। शहद में बुद्धि वर्धक गुण होते हैं। आधुनिक चिकित्सा में 6 माह से छोटे शिशु को शहद न दें — ऐसी स्थिति में प्रतीकात्मक रूप से जीभ पर स्पर्श करें।

8

हवन (20 मिनट)

हवन कुंड प्रज्वलित करें। घी, हवन सामग्री, अक्षत की आहुतियां दें। "ॐ आयुष्मान् भव" मंत्र के साथ आहुतियां समर्पित करें। पिता शिशु को गोद में लेकर हवन के समीप बैठें। पूर्णाहुति में नारियल समर्पित करें।

9

आरती एवं आशीर्वाद (10 मिनट)

कपूर और घी का दीपक जलाकर आरती करें। दादा-दादी, नाना-नानी, बुआ-मामा — सभी बड़े-बुजुर्ग शिशु को गोद में लेकर आशीर्वाद दें। शिशु के माथे पर तिलक लगाएं। शिशु को पालने में झुलाएं।

10

प्रसाद वितरण एवं भोज (15 मिनट)

मिठाई का प्रसाद सभी को वितरित करें। परिवार एवं अतिथियों को भोज कराएं। ब्राह्मण को दक्षिणा दें। पड़ोसियों और मित्रों को मिठाई भेजें। शिशु का नाम लिखकर सभी को बताएं।

📿 मंत्र

ॐ आयुष्मान् भव, सौमनस्यमान भव। नामास्य (बालक का नाम) इति

तुम दीर्घायु हो, सौम्य मन वाले हो। इसका नाम (बालक का नाम) है।

📿 अन्य मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् — गायत्री मंत्र, हवन में आहुति के साथ पढ़ें

ॐ सहनाववतु सहनौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै — शांति मंत्र, शिशु और माता-पिता के कल्याण हेतु

ॐ असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय — शिशु के ज्ञान और प्रकाश की ओर अग्रसर होने की प्रार्थना

⚠️ ये गलतियाँ न करें

✅ पूजा के बाद

✅ लाभ

  • शिशु को शास्त्रोक्त शुभ नाम मिलता है जो जीवन भर उसकी पहचान और व्यक्तित्व का आधार बनता है
  • जन्म नक्षत्र अनुसार नाम रखने से ग्रहों का शुभ प्रभाव शिशु पर पड़ता है
  • वैदिक संस्कार से शिशु का मंगलमय जीवन प्रारंभ होता है और कुलदेवता का आशीर्वाद प्राप्त होता है
  • दोनों परिवारों (ननिहाल-ससुराल) का मिलन होता है जो शिशु के पालन-पोषण में सहयोग बढ़ाता है
  • कुल परंपरा, गोत्र और संस्कृति का निर्वहन होता है — वंशावली में शिशु का नाम दर्ज होता है

❓ FAQ

नामकरण संस्कार किस दिन करना चाहिए?

जन्म के 11वें दिन सबसे प्रचलित है। 12वें, 21वें या 101वें दिन भी किया जा सकता है। शुक्ल पक्ष, शुभ नक्षत्र और शुभ तिथि में करें। शिशु और माता दोनों स्वस्थ हों यह सबसे महत्वपूर्ण है।

बालक का नाम कैसे चुनें?

जन्म नक्षत्र के अनुसार पंचांग या पंडित से नामाक्षर (पहला अक्षर) लें। राशि, नक्षत्र और कुल परंपरा के अनुसार अर्थपूर्ण नाम रखें। शास्त्रों में चार प्रकार के नाम बताए गए हैं — नक्षत्र नाम, मास नाम, कुल नाम और व्यावहारिक नाम।

क्या अस्पताल में जन्म होने पर भी नामकरण संस्कार आवश्यक है?

बिल्कुल हां। अस्पताल में जन्म प्रमाण पत्र पर लिखा नाम कानूनी होता है। नामकरण संस्कार धार्मिक और सांस्कृतिक विधि है जो घर पर या मंदिर में कभी भी की जा सकती है।

क्या नामकरण संस्कार में ननिहाल (मायके) के लोगों का होना आवश्यक है?

परंपरा के अनुसार नानी या मामा शिशु के लिए नए वस्त्र और उपहार लाते हैं। दोनों पक्षों का उपस्थित होना शुभ है और शिशु के लिए आशीर्वाद बढ़ते हैं। यदि दूरी के कारण संभव न हो तो वीडियो कॉल से जोड़ सकते हैं।

विभिन्न क्षेत्रों में नामकरण की परंपरा कैसे अलग है?

उत्तर भारत में 11वें-12वें दिन, महाराष्ट्र में 12वें दिन (बारसं), बंगाल में 21वें दिन, दक्षिण भारत में 11वें या 28वें दिन नामकरण होता है। केरल में 28वें दिन "नामकरणम्" होता है। सभी में मूल भावना एक ही है — शिशु को शुभ नाम देना।

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