अन्नप्राशन संस्कार

देवी अन्नपूर्णा, अग्निदेव 1-2 घंटे शिशु की आयु 5-6 माह (पुत्र छठे माह में, पुत्री पांचवें माह में)

📖 कथा / महत्व

अन्नप्राशन संस्कार सोलह संस्कारों में सातवां संस्कार है। शास्त्रों में कहा गया है कि अन्न ही प्राणियों का जीवन आधार है — "अन्नं वै प्राणाः"। देवी अन्नपूर्णा काशी में भगवान शिव को भी भिक्षा में अन्न देती हैं। इस संस्कार में शिशु को पहली बार अन्न (खीर) खिलाया जाता है जो माता के दूध के बाद उसके जीवन का दूसरा पोषण स्रोत बनता है। यह शिशु के शारीरिक विकास की शास्त्रोक्त शुरुआत है।

🗓️ सर्वोत्तम दिन: शुक्ल पक्ष की शुभ तिथि — द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशीपुष्य, श्रवण, रोहिणी, हस्त, मृगशिरा, अश्विनी नक्षत्र शुभबुधवार, गुरुवार या शुक्रवार विशेष शुभपुत्र का छठे माह के सम दिवस (विषम दिन न लें) मेंपुत्री का पांचवें माह के विषम दिवस में ⏱️ 1.5 से 2 घंटे (हवन, भोज एवं भविष्य परीक्षा सहित) 🟢 शुरुआती

🧘 पूजा से पहले — तैयारी

📋 सामग्री

खीर (चावल, दूध, शक्कर से बनी) — 500 ग्राम सोने की चम्मच या अंगूठी — 1 (खीर खिलाने हेतु) नए वस्त्र (शिशु हेतु) — 2 जोड़ी हवन सामग्री — 250 ग्राम हल्दी — 25 ग्राम कुमकुम — 25 ग्राम अक्षत (चावल) — 200 ग्राम फल (केला, सेब, अनार) — 5-7 पीस कलश एवं शुद्ध जल — 1 सेट गंगाजल — 100 मिली धूप एवं अगरबत्ती — 1 पैकेट घी के दीपक — 5 कपूर — 1 पैकेट नारियल — 2 मौली (कलावा) — 1 गोला चंदन — 10 ग्राम आम की लकड़ी (हवन हेतु) — 500 ग्राम पुस्तक (भविष्य परीक्षा हेतु) — 1 खिलौना (भविष्य परीक्षा हेतु) — 1 सिक्का या नोट (भविष्य परीक्षा हेतु) — 1 मिट्टी का दीपक (भविष्य परीक्षा हेतु) — 1 मिठाई (प्रसाद एवं वितरण हेतु) — 1 किलो पान, सुपारी — 11-11 पीस दक्षिणा — यथाशक्ति भोज सामग्री — अतिथियों की संख्या अनुसार

📝 पूजा विधि — चरण

1

पूजा स्थल सजावट (10 मिनट)

घर को साफ करके सजाएं। पूजा स्थल पर रंगोली बनाएं। शिशु के बैठने के लिए सजा हुआ आसन या चौकी तैयार करें। द्वार पर तोरण बांधें और शुभ चिह्न लगाएं।

2

शिशु का स्नान एवं श्रृंगार (10 मिनट)

शिशु को गुनगुने पानी से स्नान कराएं। नए वस्त्र पहनाएं — लड़की को लहंगा-चोली या फ्रॉक, लड़के को कुर्ता-टोपी। काजल लगाएं, माथे पर टीका करें। ननिहाल से आए वस्त्र पहनाना शुभ माना जाता है।

3

गणेश पूजन एवं कलश स्थापना (10 मिनट)

गणेश जी का पूजन करें — सिंदूर, दूर्वा, मोदक अर्पित करें। कलश स्थापना करें। दीपक प्रज्वलित करें। धूप-अगरबत्ती जलाएं। अन्नपूर्णा देवी का आवाहन करें।

4

संकल्प (5 मिनट)

पिता पुरोहित के साथ अन्नप्राशन संस्कार का संकल्प लें। शिशु का नाम, गोत्र, जन्म नक्षत्र और संस्कार का उद्देश्य बोलें। माता शिशु को गोद में लिए संकल्प में उपस्थित रहें।

5

देवी अन्नपूर्णा पूजन (10 मिनट)

देवी अन्नपूर्णा का आवाहन कर पूजन करें। हल्दी-कुमकुम, पुष्प, अक्षत अर्पित करें। प्रार्थना करें कि शिशु को सदैव पौष्टिक अन्न मिले और वह स्वस्थ रहे। अग्निदेव का भी स्मरण करें।

6

अन्न ग्रहण — पहला निवाला (10 मिनट)

यह संस्कार का मुख्य भाग है। पिता या मामा शिशु को गोद में लें। सोने की चम्मच या अंगूठी से खीर का पहला निवाला शिशु के मुख में रखें। "ॐ अन्नपतये नमः" मंत्र पढ़ें। फिर माता, दादी, नानी — सभी बारी-बारी शिशु को खीर चटाएं। सभी उपस्थित जन "शुभम्" बोलें।

7

भविष्य परीक्षा — वस्तु चयन (10 मिनट)

शिशु के सामने थाली में पुस्तक (विद्या), खिलौना (खेल), सिक्का (धन), मिट्टी (भूमि), पेन (लेखन) रखें। शिशु जो वस्तु सबसे पहले उठाए उसे उसके भविष्य का संकेत माना जाता है। यह प्रथा उत्सव का रोचक भाग है — परिवार में हर्ष का वातावरण बनता है।

8

हवन (15 मिनट)

हवन कुंड प्रज्वलित करें। घी, हवन सामग्री, अक्षत, चावल की आहुतियां दें। "ॐ अन्नपतये नमः स्वाहा" मंत्र से आहुतियां समर्पित करें। शिशु के स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुपोषण की प्रार्थना करें। पूर्णाहुति में नारियल समर्पित करें।

9

आरती एवं आशीर्वाद (10 मिनट)

कपूर और घी का दीपक जलाकर आरती करें। दादा-दादी, नाना-नानी, बुआ, मामा, मौसी — सभी परिवारजन शिशु को गोद में लेकर आशीर्वाद दें। शिशु के माथे पर चंदन-टीका लगाएं। उपहार दें।

10

प्रसाद वितरण एवं भोज (15 मिनट)

खीर का प्रसाद सभी को वितरित करें। मिठाई बांटें। परिवार एवं अतिथियों को भोज कराएं। ब्राह्मण को दक्षिणा एवं भोजन दें। पड़ोसियों को भी प्रसाद भेजें। इस अवसर पर निर्धनों को अन्नदान करना विशेष पुण्यदायक है।

📿 मंत्र

ॐ अन्नपतये नमः। अन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः। प्र प्र दातारं तारिषदूर्ध्वं पुनः

अन्न के स्वामी को नमस्कार। हमें बलवान करने वाला, रोग-रहित अन्न प्रदान करें। दाता की सदा उन्नति हो।

📿 अन्य मंत्र

ॐ अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राणवल्लभे। ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति — अन्नपूर्णा स्तोत्र, देवी से अन्न और ज्ञान की प्रार्थना

ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै — शांति मंत्र, शिशु और परिवार के कल्याण हेतु हवन में पढ़ें

ॐ भद्रं कर्णेभिः श्रृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः — शिशु के कानों को शुभ ध्वनि और नेत्रों को शुभ दृश्य मिलें, ऐसी वैदिक प्रार्थना

⚠️ ये गलतियाँ न करें

✅ पूजा के बाद

✅ लाभ

  • शिशु के शारीरिक विकास की शास्त्रोक्त और वैज्ञानिक शुरुआत — सही समय पर ठोस आहार का प्रारंभ
  • माता के दूध के साथ पूरक पोषण मिलने से शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है
  • पारिवारिक बंधन मजबूत होते हैं — दोनों पक्षों के परिवार एक साथ आते हैं और शिशु को आशीर्वाद देते हैं
  • कुल संस्कारों और वैदिक परंपरा का निर्वहन — शिशु को संस्कारित जीवन की ओर अग्रसर करता है
  • भविष्य परीक्षा से परिवार में उत्साह और आनंद का वातावरण बनता है

❓ FAQ

अन्नप्राशन कब करना चाहिए?

पुत्र का छठे माह में (सम दिवस) और पुत्री का पांचवें माह में (विषम दिवस) अन्नप्राशन करने का विधान है। शुक्ल पक्ष, शुभ नक्षत्र और शुभ तिथि में करें। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि शिशु स्वस्थ हो और बाल रोग चिकित्सक ने ठोस आहार की अनुमति दी हो।

अन्नप्राशन में पहला अन्न क्या खिलाएं?

खीर (चावल, दूध, शक्कर) सबसे शुभ और उत्तम माना जाता है। यह सुपाच्य और पोषक है। कुछ परिवारों में मिश्री-घी-चावल खिलाते हैं। दक्षिण भारत में चावल-दाल का मिश्रण (खिचड़ी) भी खिलाया जाता है।

भविष्य परीक्षा में शिशु ने पुस्तक उठाई तो क्या अर्थ है?

पुस्तक उठाना विद्या और ज्ञान का संकेत माना जाता है। सिक्का उठाना धन-समृद्धि, खिलौना उठाना क्रीड़ा-कला, मिट्टी उठाना भूमि-संपत्ति, पेन उठाना लेखन-साहित्य का संकेत है। यह एक लोक परंपरा है और इसे मनोरंजन की दृष्टि से देखना उचित है।

क्या मामा का पहला निवाला खिलाना अनिवार्य है?

कई क्षेत्रों, विशेषकर बंगाल और पूर्वी भारत में मामा द्वारा पहला निवाला खिलाने की परंपरा है। उत्तर भारत में पिता खिलाते हैं। यह क्षेत्रीय परंपरा है — दोनों शुभ हैं। महत्वपूर्ण यह है कि परिवार का प्रेम शिशु तक पहुंचे।

अन्नप्राशन के बाद शिशु को क्या-क्या खिला सकते हैं?

अन्नप्राशन के बाद धीरे-धीरे शुरू करें — पहले सप्ताह चावल का पानी या दाल का पानी, फिर मसला केला, सूजी की खीर, उबली सब्जियों का प्यूरी। एक समय में एक ही नया भोजन दें। मसालेदार, तले हुए या बाहर का भोजन न दें। बाल रोग चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

और पूजा विधियाँ पढ़ें

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